CAG रिपोर्ट 2025: MPPSC भर्ती प्रक्रिया की बड़ी खामियाँ सामने आईं

CAG Performance Audit में MPPSC की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल

Check CAG REPORT ON MPSPC – The Madhya Pradesh Public Service Commission (MPPSC) was established on 1 November 1956. The Chairman and Members are appointed by the Hon’ble Governor for a term of six years or until the age of 62 years. The expenses are charged to the Consolidated Fund of the State, and the Annual Report submitted to the Hon’ble Governor for presentation to the Legislature.

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा जारी हालिया रिपोर्ट में मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं। मार्च 2023 तक की अवधि को कवर करने वाली इस रिपोर्ट में भर्ती प्रक्रिया में देरी, रिक्त पदों का सत्यापन न होना, पदोन्नति मामलों में अनियमितता और वित्तीय प्रबंधन में लापरवाही जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे सामने आए हैं।

CAG की विस्तृत Performance Audit रिपोर्ट (मार्च 2023 तक) में MPPSC की भर्ती प्रक्रिया, आरक्षण अनुपालन, वित्तीय प्रबंधन और प्रशासनिक समन्वय से जुड़ी अनेक कमियाँ उजागर हुई हैं।

रिपोर्ट के अनुसार विभागों द्वारा रिक्तियों की सूचना देने में वर्षों की देरी, विज्ञापन जारी करने में औसत 136 दिन की देरी, परीक्षा कैलेंडर का पालन न होना, वेटिंग लिस्ट से नियुक्ति में लापरवाही तथा पदोन्नति मामलों में भ्रम की स्थिति जैसी गंभीर अनियमितताएँ सामने आई हैं।

इसके अतिरिक्त ₹115 करोड़ से अधिक बजट का सरेंडर, ₹61 लाख से अधिक TDS की कटौती न होना, विषय विशेषज्ञ सूची अपडेट न करना और IT मॉड्यूल का एकीकृत न होना आयोग की प्रशासनिक दक्षता पर प्रश्न खड़े करता है।

कुल मिलाकर यह रिपोर्ट बताती है कि भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता, समयबद्धता और वित्तीय अनुशासन को सुदृढ़ करने की अत्यंत आवश्यकता है।

CAG रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष

नीचे विस्तृत CAG रिपोर्ट (Performance Audit – Chapter II) का मुख्य भाग के लिए बिंदुवार विश्लेषण प्रस्तुत है।

1. रिक्तियों की सूचना में देरी
  • पाँच विभागों ने 101 रिक्त पदों की जानकारी आयोग को देने में 31 से 68 माह की देरी की।
  • आयोग ने रिक्तियाँ रिपोर्ट करने की कोई समय-सीमा तय नहीं की।
  • 2019 की परीक्षा हेतु 330 पदों का विज्ञापन 14 महीने की देरी से निकला।
  • इससे भर्ती प्रक्रिया अनावश्यक रूप से लंबित रही।
2. रिक्तियों का प्रारूप बदलने से आरक्षण सत्यापन प्रभावित
  • 2019 में पुराना प्रोफॉर्मा हटाकर नया प्रारूप लागू किया गया।
  • बैकलॉग, प्रमोशन व नई रिक्तियों का अलग-अलग विवरण हटाया गया।
  • 120 में से 25 मामलों (21%) में आरक्षण नीति के अनुपालन में त्रुटि पाई गई।
  • आयोग के पास आरक्षण सत्यापन की आंतरिक व्यवस्था नहीं रही।
3. पुलिस उपाधीक्षक (DSP) भर्ती में त्रुटि
  • गृह विभाग में 128 पद रिक्त थे।
  • आयोग ने केवल 37 अभ्यर्थियों की भर्ती की।
  • आयोग ने वास्तविक रिक्तियों का सत्यापन नहीं किया।
4. दिव्यांग आरक्षण के कारण 4 साल की देरी
  • Assistant Professor भर्ती में बार-बार संशोधन (2016–2022)।
  • दिव्यांग पदों में कई बार बदलाव।
  • हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि आरक्षण स्वीकृत पदों के आधार पर तय होगा।
  • परिणाम: लगभग 4 वर्ष चयन प्रक्रिया में देरी।
5. परीक्षा कैलेंडर का पालन नहीं
  • 2018-23 के दौरान तय 44 परीक्षाओं में से केवल 22 परीक्षाएँ समय पर आयोजित हुईं।
  • 21 परीक्षाएँ निर्धारित समय से बाद में आयोजित की गईं।
  • कैलेंडर योजना में पारदर्शिता की कमी।
6. विज्ञापन जारी करने में देरी
  • 94 विज्ञापनों में से 30 विज्ञापन एक माह से अधिक देर से जारी।
  • औसत देरी: 136 दिन।
  • कोई निश्चित समय-सीमा निर्धारित नहीं।
7. चयन प्रक्रिया में विलंब
  • कुल 48 परीक्षाओं में से 18 परीक्षाओं में चयन प्रक्रिया देर से पूरी हुई:
    • 9 एक-स्तरीय परीक्षा: 1 से 10 माह देरी
    • 8 दो-स्तरीय परीक्षा: 7 से 25 माह देरी
    • 1 तीन-स्तरीय परीक्षा: 11 माह देरी
8. वेटिंग लिस्ट से नियुक्ति में लापरवाही
  • वाणिज्यिक कर विभाग ने 3 टैक्स इंस्पेक्टर व 4 कमर्शियल टैक्स ऑफिसर की नियुक्ति समयसीमा में नहीं की।
  • नियुक्तियाँ निरस्त होने में देरी के कारण वेटिंग लिस्ट जारी नहीं हुई।
  • योग्य अभ्यर्थियों को अवसर से वंचित किया गया।
  • उप-पंजीयक पदों पर भी वेटिंग लिस्ट से सिफारिश नहीं की गई।
9. ARTO पदों पर दोहरी परीक्षा
  • परिवहन विभाग ने एक ही रिक्तियों के लिए दो बार मांग भेजी।
  • आयोग ने सत्यापन किए बिना दो बार परीक्षा कराई।
  • 13 पदों के विरुद्ध 26 अभ्यर्थियों की सिफारिश कर दी।
10. पदोन्नति में आरक्षण संबंधी अनियमितता
  • सीमित विभागीय परीक्षा में 71 BDO पदों पर OBC आरक्षण अनुचित रूप से दिया गया।
  • उच्च न्यायालय के आदेश (अप्रैल 2016) के बाद भी 47 DPC मामलों में कार्रवाई नहीं हुई।
  • अधिकारियों को समय पर पदोन्नति नहीं मिली।
11. विषय विशेषज्ञ सूची अपडेट नहीं
  • 2018 से विषय विशेषज्ञों की सूची अपडेट नहीं की गई।
  • परीक्षा मैनुअल के अनुसार हर वर्ष जून/जुलाई में अपडेट आवश्यक था।
12. इंटरव्यू बोर्ड गठन में कमी
  • 16 में से 15 मामलों में इंटरव्यू बोर्ड में आयोग का कोई सदस्य शामिल नहीं था।
  • प्रक्रिया नियमों में स्पष्टता की कमी रही।
13. ऑनलाइन परीक्षा लागू नहीं
  • 2014 में निर्णय के बावजूद केवल 26% परीक्षाएँ ऑनलाइन।
  • निर्णय का पालन नहीं।
14. सेवा नियमों में संशोधन लंबित
  • 10 वर्षों से अधिक समय से सेवा नियम संशोधन का प्रस्ताव लंबित।
  • न स्वीकृति मिली, न प्रकाशन हुआ।
15. परीक्षा व्यय के उपयोग प्रमाणपत्र लंबित
  • 199 में से 34 मामलों में ₹4.99 करोड़ के उपयोग प्रमाणपत्र जमा नहीं किए गए।
  • कुल ₹51.18 करोड़ परीक्षा संचालन हेतु जारी हुए थे।
16. 42% बजट सरेंडर
  • ₹272.92 करोड़ में से ₹115.83 करोड़ लौटाए गए।
  • अधिकतर राशि मार्च में सरेंडर।
  • वित्तीय योजना कमजोर।
17. स्टाफ की कमी
  • 2018-23 में 21% से 24% तक स्टाफ की कमी।
  • परीक्षा नियंत्रक के दो पदों में से एक ही भरा गया।
  • सुरक्षा अधिकारी, सिस्टम एनालिस्ट आदि पद लंबे समय तक रिक्त रहे।
18. कर (TDS) वसूली में लापरवाही
  • प्रिंटर्स के बिल से ₹46.55 लाख आयकर TDS व ₹14.88 लाख GST TDS नहीं काटा गया।
  • खराब प्रदर्शन के बावजूद ₹30 लाख की Earnest Money जब्त नहीं की गई।

You can read full detailed report here – View PDF

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